मरांग बुरु की छाया में गूंजा सोहराय का उत्सव, बेझातुन के साथ पांच दिवसीय पर्व का भव्य समापन

मिहिजाम। केलाही गांव स्थित मरांग बुरु के समीप मैदान में संताल समुदाय का पांच दिवसीय पारंपरिक पर्व सोहराय पूरे श्रद्धा, उल्लास और सांस्कृतिक गरिमा के साथ संपन्न हो गया। समापन अवसर पर आयोजित बेझातुन अनुष्ठान ने वातावरण को आध्यात्मिक ऊर्जा और लोकसंस्कृति के रंगों से सराबोर कर दिया। इस पावन मौके पर सैकड़ों की संख्या में संताल समाज के महिला, पुरुष और बच्चे पारंपरिक परिधान धारण कर कार्यक्रम में शामिल हुए।ढोल नगाड़ों की गूंज, सोहराय गीतों की लय और लागरे नृत्य की मनोहारी प्रस्तुति ने पूरे मैदान को उत्सव स्थल में परिवर्तित कर दिया। रंग बिरंगे परिधानों में नृत्य करते प्रतिभागी न केवल पर्व की खुशियां मना रहे थे, बल्कि अपनी सदियों पुरानी सांस्कृतिक विरासत को जीवंत रूप में प्रस्तुत कर रहे थे। यह आयोजन नई पीढ़ी के लिए अपनी परंपराओं को समझने और आत्मसात करने का प्रभावी माध्यम बना।कार्यक्रम में मांझी हड़ाम किस्तोरी हेंब्रम, मुखिया माखोनी हेंब्रम, गुरु हड़ाम रेणु मुर्मू, महेंद्र टुडू और भारतेंदु मुर्मू सहित अनेक समाजसेवी एवं ग्रामीण गणमान्य उपस्थित रहे। वक्ताओं ने अपने संबोधन में सोहराय पर्व को प्रकृति, कृषि और पशुधन से जुड़ा संताल समाज का महत्वपूर्ण उत्सव बताते हुए इसकी सामाजिक और सांस्कृतिक महत्ता पर प्रकाश डाला।समापन की प्रमुख रस्म बेझातुन में केले के गाछ से बने प्रतीक का तीर धनुष से वध कर विधिवत विसर्जन किया गया, जो बुराई के अंत और सुख समृद्धि के आगमन का प्रतीक माना जाता है। पूरे आयोजन के दौरान अनुशासन, आपसी सौहार्द और सांस्कृतिक गौरव की स्पष्ट झलक देखने को मिली।

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