बाहा पर्व की रंगत में सराबोर गोदलीपाहड़ी: परंपरा, प्रकृति और संस्कृति का अद्भुत संगम

तहलका न्यूज 24 संवाददाता काजल राय चौधरी जामताड़ा। गोदलीपाहड़ी स्थित जाहेर थान में मानवी मार्शल क्लब के तत्वावधान में आदिवासी समाज के प्रमुख पर्व बाहा का आयोजन अत्यंत उत्साह, श्रद्धा और पारंपरिक गरिमा के साथ किया गया। इस अवसर पर पूरा क्षेत्र सांस्कृतिक रंगों में रंगा नजर आया, जहां ग्रामीणों ने एकजुट होकर प्रकृति के प्रति अपनी अटूट आस्था और परंपराओं के प्रति गहरी निष्ठा का परिचय दिया।सुबह से ही जाहेर थान परिसर में लोगों की भीड़ जुटने लगी थी। महिलाएं पारंपरिक परिधान में सजी धजी नजर आईं, वहीं पुरुष भी अपने सांस्कृतिक वेश में शामिल हुए। वातावरण में मांदर और ढोल की मधुर ध्वनि गूंज रही थी, जिससे पूरा इलाका भक्तिमय और उत्सवपूर्ण हो उठा। सभी ने मिलकर विधि विधान से पूजा अर्चना की और प्रकृति के प्रति कृतज्ञता व्यक्त की।इस धार्मिक अनुष्ठान में समाज के कई प्रमुख लोग शामिल हुए। नाईकी गिरीस सोरेन, कुडम नाईकी मैनेजर सोरेन, मांझी बाबा बीबीलाल सोरेन, पौराणिक वीरेंद्र हेंब्रम, मुखिया जोसेफ मुर्मू और ओफिसर सोरेन सहित अन्य गणमान्य व्यक्तियों की उपस्थिति ने आयोजन की गरिमा को और बढ़ा दिया। इन सभी ने सामूहिक रूप से साल वृक्ष के नए पुष्पों की पूजा की, जो बाहा पर्व का सबसे महत्वपूर्ण और पवित्र अनुष्ठान माना जाता है।बाहा पर्व को आदिवासी समाज में नए वर्ष के आगमन का प्रतीक माना जाता है। यह केवल एक धार्मिक पर्व नहीं, बल्कि प्रकृति के साथ सह अस्तित्व की भावना को दर्शाने वाला उत्सव है। इस दिन साल वृक्ष के नए फूलों को पूजकर लोग प्रकृति के प्रति अपनी आभार भावना व्यक्त करते हैं और जीवन में सुख समृद्धि, शांति और समृद्धि की कामना करते हैं।ग्रामीणों ने बताया कि बाहा पर्व का महत्व केवल पूजा तक सीमित नहीं है, बल्कि यह पर्यावरण संरक्षण और प्राकृतिक संसाधनों के प्रति जिम्मेदारी का संदेश भी देता है। इस पर्व के माध्यम से समाज के लोगों को पेड़ पौधों, जंगलों और जल स्रोतों की रक्षा के लिए प्रेरित किया जाता है। यह परंपरा पीढ़ी दर पीढ़ी चली आ रही है, जो आज भी उतनी ही मजबूती से जीवित है।कार्यक्रम का एक प्रमुख आकर्षण सांस्कृतिक प्रस्तुतियां रहीं। मानवी मार्शल क्लब द्वारा आयोजित पारंपरिक नृत्य कार्यक्रम में युवाओं और युवतियों ने बढ़ चढ़कर हिस्सा लिया। सभी कलाकार पारंपरिक आदिवासी वेशभूषा में सजे हुए थे, जो उनकी सांस्कृतिक पहचान को दर्शा रहे थे। मांदर, ढोल और नगाड़ों की थाप पर प्रस्तुत किए गए लोकगीत और नृत्य ने पूरे माहौल को जीवंत बना दिया।नृत्य के दौरान कलाकारों की ऊर्जा और उत्साह देखते ही बन रहा था। दर्शक भी इस रंगारंग कार्यक्रम का पूरा आनंद लेते नजर आए। तालियों की गूंज और उत्साहवर्धन से कलाकारों का मनोबल और बढ़ता गया। कई जगहों पर दर्शक भी खुद को रोक नहीं पाए और नृत्य में शामिल हो गए, जिससे पूरा वातावरण एक उत्सव में बदल गया।इस आयोजन ने सामाजिक एकता और भाईचारे का भी अद्भुत उदाहरण प्रस्तुत किया। गांव के सभी लोग बिना किसी भेदभाव के एक साथ इस पर्व को मनाते दिखे। बुजुर्गों से लेकर बच्चों तक सभी ने मिलकर अपनी संस्कृति और परंपराओं को जीवित रखने का संकल्प लिया।गांव के बुजुर्गों ने कहा कि ऐसे आयोजन न केवल हमारी पहचान को मजबूत करते हैं, बल्कि नई पीढ़ी को अपनी जड़ों से जोड़ने का भी कार्य करते हैं। आज के आधुनिक दौर में जहां लोग अपनी संस्कृति से दूर होते जा रहे हैं, वहां बाहा पर्व जैसे आयोजन समाज को अपनी परंपराओं की याद दिलाते हैं और उन्हें संजोकर रखने की प्रेरणा देते हैं।पूरे कार्यक्रम के दौरान अनुशासन और शांति का विशेष ध्यान रखा गया। आयोजन समिति के सदस्यों ने व्यवस्थाओं को सुचारू रूप से संचालित किया, जिससे कार्यक्रम बिना किसी बाधा के सफलतापूर्वक संपन्न हुआ। बड़ी संख्या में स्थानीय लोगों की भागीदारी ने इस आयोजन को और भी भव्य बना दिया।अंत में सभी ने एक स्वर में यह संकल्प लिया कि वे अपनी सांस्कृतिक विरासत और प्राकृतिक संसाधनों की रक्षा के लिए निरंतर प्रयासरत रहेंगे। बाहा पर्व के इस आयोजन ने एक बार फिर यह साबित कर दिया कि जब समाज एकजुट होकर अपनी परंपराओं को मनाता है, तो वह न केवल अपनी पहचान को मजबूत करता है, बल्कि आने वाली पीढ़ियों के लिए एक प्रेरणा भी छोड़ जाता है।

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