काशी में आयुर्वेद की परंपरा का गौरवपूर्ण उत्सव: राष्ट्रीय आयुर्वेद विद्यापीठ का 29वां दीक्षांत समारोह संपन्न

तहलका न्यूज 24 संवाददाता काजल राय चौधरी पीआईबी प्रेस रिलीज़ वाराणसी। भारत की प्राचीन चिकित्सा पद्धति आयुर्वेद की समृद्ध परंपरा और गुरु शिष्य संस्कृति को नई ऊर्जा देते हुए राष्ट्रीय आयुर्वेद विद्यापीठ का 29वां दीक्षांत समारोह एवं शिष्योपनयन संस्कार वाराणसी स्थित बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के स्वतंत्रता भवन में भव्य रूप से आयोजित किया गया। इस समारोह में सर्टिफिकेट ऑफ राष्ट्रीय आयुर्वेद विद्यापीठ कार्यक्रम के तहत प्रशिक्षित विद्वानों की उपलब्धियों का सम्मान किया गया और आयुर्वेद की पारंपरिक ज्ञान परंपरा को आगे बढ़ाने का संकल्प दोहराया गया।कार्यक्रम के मुख्य अतिथि के रूप में भारत सरकार के आयुष मंत्रालय में केंद्रीय राज्य मंत्री स्वतंत्र प्रभार तथा स्वास्थ्य एवं परिवार कल्याण मंत्रालय के राज्य मंत्री प्रतापराव जाधव ने वर्चुअल माध्यम से संबोधन दिया। उन्होंने कहा कि काशी जैसे आध्यात्मिक और ज्ञान की भूमि से आयुर्वेद के विद्वानों को संबोधित करना उनके लिए गर्व की बात है। उन्होंने काशी को आयुर्वेदिक ज्ञान का प्राचीन केंद्र बताते हुए कहा कि इस पावन धरती का संबंध भगवान धन्वंतरि दिवोदास से रहा है, जिन्हें अष्टांग आयुर्वेद में शल्य चिकित्सा का जनक माना जाता है।मंत्री ने बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के संस्थापक महामना पंडित मदन मोहन मालवीय को श्रद्धांजलि अर्पित करते हुए कहा कि उनकी दूरदृष्टि के कारण बीएचयू आज आयुर्वेदिक शिक्षा और अनुसंधान का महत्वपूर्ण केंद्र बन चुका है। उन्होंने कहा कि आयुर्वेद केवल उपचार की पद्धति नहीं, बल्कि एक व्यापक जीवनदर्शन है, जो स्वास्थ्य, जीवनशैली और प्रकृति के साथ संतुलन का मार्ग दिखाता है।प्रतापराव जाधव ने अपने संबोधन में आयुर्वेद की गुरु शिष्य परंपरा के महत्व को रेखांकित करते हुए कहा कि इसी परंपरा ने सदियों से आयुर्वेद के ज्ञान को सुरक्षित रखा और आगे बढ़ाया है। उन्होंने कहा कि धन्वंतरि, चरक, सुश्रुत और वाग्भट जैसे महान आयुर्वेदाचार्य इसी ज्ञान परंपरा की देन हैं।उन्होंने राष्ट्रीय आयुर्वेद विद्यापीठ की सराहना करते हुए कहा कि सीआरएवी और एमआरएवी जैसे कार्यक्रमों के माध्यम से युवा चिकित्सकों को अनुभवी वैद्यों से सीधे प्रशिक्षण का अवसर दिया जा रहा है, जो आयुर्वेद की परंपरा को जीवंत बनाए रखने में महत्वपूर्ण भूमिका निभा रहा है। उन्होंने आरएवी के शासी निकाय के अध्यक्ष पद्म भूषण वैद्य देवेंद्र त्रिगुणा और संस्थान की निदेशक डॉ. वंदना सिरोहा के नेतृत्व की भी प्रशंसा की।मंत्री ने प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी के नेतृत्व में आयुष प्रणालियों को मिली वैश्विक पहचान का भी उल्लेख किया। उन्होंने कहा कि योग और आयुष की लोकप्रियता लगातार बढ़ रही है और यह भारत की स्वास्थ्य कूटनीति को भी मजबूती दे रही है। आयुष मंत्रालय आयुर्वेद, योग, प्राकृतिक चिकित्सा, यूनानी, सिद्ध, सोवा रिग्पा और होम्योपैथी जैसी पारंपरिक चिकित्सा प्रणालियों में शिक्षा, अनुसंधान और प्रशिक्षण को मजबूत करने की दिशा में निरंतर प्रयास कर रहा है।दीक्षांत समारोह में उपस्थित विद्यार्थियों और विद्वानों को संबोधित करते हुए उन्होंने कहा कि यह उपलब्धि केवल शैक्षणिक सफलता का प्रतीक नहीं है, बल्कि समाज के प्रति नई जिम्मेदारी की शुरुआत भी है। उन्होंने युवाओं से पारंपरिक ज्ञान को आधुनिक वैज्ञानिक शोध के साथ जोड़ने और आयुर्वेद को साक्ष्य आधारित तथा वैश्विक स्तर पर स्वीकार्य बनाने में योगदान देने का आह्वान किया। साथ ही उन्होंने चिकित्सा क्षेत्र में करुणा, नैतिकता और मृदु कौशलों के महत्व पर भी जोर दिया।आयुष मंत्रालय के सचिव पद्मश्री वैद्य राजेश कोटेचा ने भी कार्यक्रम को संबोधित करते हुए सभी सफल विद्वानों को बधाई दी। उन्होंने उन्हें अनुसंधान, वैज्ञानिक अध्ययन और लेखन में सक्रिय भागीदारी के लिए प्रेरित किया। उन्होंने कहा कि आयुष पद्धतियों की विश्वसनीयता और अंतरराष्ट्रीय स्वीकृति को मजबूत बनाने के लिए प्रमाण आधारित शोध अत्यंत आवश्यक है। उन्होंने मंत्रालय द्वारा किए जा रहे विभिन्न प्रयासों का उल्लेख करते हुए अखिल भारतीय आयुर्वेद संस्थान के विस्तार तथा डब्ल्यूएचओ वैश्विक पारंपरिक चिकित्सा केंद्र के विकास की जानकारी दी।बनारस हिंदू विश्वविद्यालय के कुलपति प्रोफेसर अजीत कुमार चतुर्वेदी ने विद्यार्थियों को संबोधित करते हुए कहा कि आयुष क्षेत्र तेजी से आगे बढ़ रहा है और इसमें युवाओं के लिए अनेक अवसर मौजूद हैं। उन्होंने छात्रों से अध्ययन में निरंतरता और समर्पण बनाए रखने का आग्रह किया।आरएवी के शासी निकाय के अध्यक्ष पद्म भूषण और पद्मश्री से सम्मानित वैद्य देवेंद्र त्रिगुणा ने अपने वक्तव्य में कहा कि राष्ट्रीय आयुर्वेद विद्यापीठ का उद्देश्य उत्कृष्ट आयुर्वेदिक चिकित्सकों को तैयार करना है और संस्थान इस दिशा में सफलतापूर्वक कार्य कर रहा है। उन्होंने कहा कि देश में आयुर्वेद से जुड़े कॉलेजों और विश्वविद्यालयों की संख्या बढ़ने से इस क्षेत्र का भविष्य और अधिक उज्ज्वल दिखाई दे रहा है। उन्होंने युवा चिकित्सकों से वैद्य की उपाधि पर गर्व करने और आयुर्वेद को वैश्विक पहचान दिलाने में सक्रिय भूमिका निभाने की अपील की।कार्यक्रम की शुरुआत में आरएवी की निदेशक डॉ. वंदना सिरोहा ने सभी अतिथियों और प्रतिभागियों का स्वागत किया। उन्होंने आयुर्वेद की गुरु शिष्य परंपरा को संरक्षित करने और उन्नत प्रशिक्षण कार्यक्रमों के माध्यम से आयुर्वेद के ज्ञान को आगे बढ़ाने में संस्थान की भूमिका पर प्रकाश डाला।समारोह में आयुर्वेद के क्षेत्र में उत्कृष्ट योगदान देने वाली कई प्रतिष्ठित हस्तियों को सम्मानित भी किया गया। वैद्य निर्मला शर्मा, केवल कृष्ण ठकराल और गिरधारी लाल मिश्रा को आजीवन उपलब्धि पुरस्कार प्रदान किया गया। इसके अलावा कई विद्वानों और चिकित्सकों को आरएवी फेलोशिप से सम्मानित किया गया, जिनमें वैद्य योगेंद्र कुमार शर्मा, वैद्य दिनेश चंद्र कटोच, वैद्य तनुजा मनोज नेसरी, वैद्य भृगुपति पांडे, वैद्य मुरलीधर शर्मा, वैद्य बी. श्रीनिवास प्रसाद, वैद्य उमेश शुक्ला, वैद्य मिलिंद कुलकर्णी, वैद्य पी.के. गोस्वामी, वैद्य एम. मोहन अल्वा, वैद्य पी.एल.टी. गिरिजा, वैद्य राम जयसुंदर और वैद्य वैष्णव प्रदीप यू शामिल रहे।यह समारोह आयुर्वेद की समृद्ध परंपरा और आधुनिक चिकित्सा जगत के बीच सेतु का कार्य करते हुए पारंपरिक ज्ञान को नई पीढ़ी तक पहुंचाने का प्रेरणादायक मंच साबित हुआ। साथ ही इस आयोजन ने आयुष मंत्रालय की उस प्रतिबद्धता को भी रेखांकित किया, जिसके तहत आयुर्वेद को वैश्विक स्तर पर सम्मानित और स्वीकार्य स्वास्थ्य प्रणाली के रूप में स्थापित करने के प्रयास जारी हैं।

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