मिहिजाम। झारखंड राज्य के गठन के बाद मिहिजाम में पहला नगर निकाय चुनाव वर्ष 2008 में संपन्न हुआ था। उस समय मिहिजाम को नगर पंचायत का दर्जा प्राप्त था। पहले नगर निकाय चुनाव के परिणामस्वरूप बालमुकुंद रविदास को अध्यक्ष और कमल गुप्ता को उपाध्यक्ष पद की जिम्मेदारी मिली थी। उस दौर में मिहिजाम की तस्वीर काफी अलग थी। न तो पक्की सड़कों की व्यवस्था थी और न ही शहरी जलापूर्ति जैसी बुनियादी सुविधाएं मौजूद थीं।समय के साथ मिहिजाम के शहरी क्षेत्र में कई बदलाव देखने को मिले। विकास की रफ्तार के साथ नगर पंचायत को नगर परिषद का दर्जा मिला। पिछले लगभग डेढ़ दशक में पक्की सड़कों का निर्माण, कुछ क्षेत्रों में नालियों की व्यवस्था, आवास योजना के तहत पक्के घर, नगर परिषद का नया भवन, नगर भवन तथा शहरी जलापूर्ति योजना जैसी कई परियोजनाएं धरातल पर उतरीं। इसके अलावा स्टेडियम, पार्क और स्नेहपुर कुष्ठ आश्रम में 64 पक्के मकानों का निर्माण भी अंतिम चरण में है, जिनका जल्द ही लोकार्पण होने की संभावना है।इन तमाम विकास कार्यों के बावजूद मिहिजाम के नागरिक आज भी कई मूलभूत सुविधाओं से वंचित हैं। पूरे शहर में अब तक एक सुदृढ़ और व्यवस्थित ड्रेनेज सिस्टम विकसित नहीं हो सका है। कई स्थानों पर सड़क के ऊपर सड़क बना दी गई, लेकिन जल निकासी की समुचित व्यवस्था नहीं होने से बरसात के दिनों में लोगों को भारी परेशानी का सामना करना पड़ता है।विकास योजनाओं की इस लंबी सूची के बीच एक ऐसी योजना भी है, जिसे मिहिजाम नगर परिषद की सबसे असफल योजना के रूप में देखा जा रहा है। यह योजना है सामुदायिक शौचालय निर्माण योजना। नगर परिषद क्षेत्र के विभिन्न इलाकों में करीब 10 से अधिक सामुदायिक शौचालयों का निर्माण कराया गया था। प्रत्येक शौचालय पर लगभग 24 लाख 50 हजार रुपये या उससे अधिक की राशि खर्च की गई। बावजूद इसके, आज ये सामुदायिक शौचालय उपयोग के अभाव में खंडहर में तब्दील होते जा रहे हैं।स्थानीय लोगों का कहना है कि इन शौचालयों का न तो कभी नियमित रूप से उपयोग हुआ और न ही नगर परिषद द्वारा इनके रखरखाव की कोई ठोस व्यवस्था की गई। परिणामस्वरूप यह महत्वाकांक्षी योजना ठेकेदारी प्रथा की भेंट चढ़ गई और सरकारी धन का खुला दुरुपयोग साबित हुई।सबसे हैरानी की बात यह है कि नगर निकाय चुनाव 2026 के प्रचार-प्रसार में सामुदायिक शौचालयों की बदहाली का मुद्दा पूरी तरह गायब है। किसी भी प्रत्याशी द्वारा यह नहीं बताया जा रहा कि इन शौचालयों को दोबारा कैसे सुचारू किया जाएगा। ऐसे में मतदाताओं के बीच यह सवाल उठ रहा है कि क्या चुनावी वादे सिर्फ नए निर्माण तक सीमित रहेंगे या फिर पुरानी और विफल योजनाओं की जवाबदेही भी तय होगी।
नगर पंचायत से नगर परिषद तक का सफर: विकास के दावे और सामुदायिक शौचालयों की बदहाली बना चुनावी सवाल
