चुनावी शोर में दबा मूल सवाल: 18 वर्षों बाद भी मिहिजाम को नहीं मिला अपना बस अड्डा

मिहिजाम। मिहिजाम नगर परिषद के गठन को 18 साल बीत चुके हैं, लेकिन शहर आज भी एक स्थायी बस स्टैंड और टेंपो स्टैंड जैसी बुनियादी सुविधा से वंचित है। वर्ष 2008 में नगर पंचायत के रूप में अस्तित्व में आया यह क्षेत्र अब नगर परिषद का दर्जा प्राप्त कर चुका है। तीन निकाय चुनाव हो चुके हैं और चौथी बार मतदाता अपने जनप्रतिनिधि चुनने की तैयारी में हैं, फिर भी परिवहन व्यवस्था का स्थायी समाधान अब तक नहीं हो सका है।राज्य की सीमा पर स्थित मिहिजाम भौगोलिक दृष्टि से बेहद अहम माना जाता है। मैथन और चित्तरंजन जैसे औद्योगिक केंद्रों की नजदीकी तथा राष्ट्रीय राजमार्ग 419 की उपलब्धता इसे आवागमन का प्रमुख मार्ग बनाती है। यहां से बिहार, पश्चिम बंगाल और झारखंड के विभिन्न हिस्सों के लिए प्रतिदिन कई लंबी दूरी और स्थानीय रूट की बसें संचालित होती हैं।विडंबना यह है कि इतने महत्वपूर्ण स्थान पर आज तक एक व्यवस्थित बस टर्मिनल का निर्माण नहीं हो पाया है। इंदिरा चौक के समीप सड़क किनारे ही बसों का ठहराव और प्रस्थान होता है। भागलपुर और दुर्गापुर जाने वाली बसें भी यहीं से चलती हैं। स्थानीय रूट की बसों के लिए न तो कोई तय प्लेटफॉर्म है और न ही पार्किंग की सुविधा। परिणामस्वरूप सड़क पर ही वाहनों की कतार लग जाती है और यातायात प्रभावित होता है।यही स्थिति टेंपो और टोटो वाहनों की भी है, जो जामताड़ा, चित्तरंजन, रूपनारायणपुर और ग्रामीण इलाकों के लिए चलते हैं। अलग स्टैंड नहीं होने के कारण ये वाहन भी मुख्य मार्ग पर ही खड़े रहते हैं। सुबह-शाम के व्यस्त समय में इंदिरा चौक के आसपास जाम लगना आम दृश्य बन चुका है। अव्यवस्थित खड़े वाहनों के कारण दुर्घटना की संभावना भी बनी रहती है।हालांकि नगर विकास विभाग की ओर से बस स्टैंड निर्माण की रूपरेखा वर्षों पहले तैयार की गई थी, लेकिन यह योजना अब तक धरातल पर नहीं उतर सकी। विभिन्न कार्यकालों में कई पदाधिकारी और जनप्रतिनिधि बदले, परंतु ठोस प्रगति नहीं हो पाई। परियोजना के लिए उपयुक्त जमीन का चयन न हो पाना सबसे बड़ी बाधा बताया जा रहा है।सिटी मैनेजर विजय कुमार के अनुसार, बस स्टैंड निर्माण की प्रस्तावित योजना तैयार है और आवश्यक स्वीकृति मिलते ही काम शुरू किया जाएगा। मगर फिलहाल यह पहल आश्वासन तक ही सीमित है।ऐसे में चौथे निकाय चुनाव से पहले शहर में एक बार फिर यह मुद्दा चर्चा में है। मतदाता अब बुनियादी सुविधाओं को प्राथमिकता देने की बात कर रहे हैं। देखना होगा कि इस बार चुने जाने वाले प्रतिनिधि वर्षों से लंबित इस मांग को हकीकत में बदल पाते हैं या नहीं।

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