विरासत के नाम पर उत्सव, हकीकत में उपेक्षा, चिरेका का ‘जी-9’ बना बदहाली का प्रतीक

तहलका न्यूज 24 संवाददाता काजल राय चौधरी चित्तरंजन। रेलनगरी चित्तरंजन स्थित चित्तरंजन रेल इंजन कारखाना (चिरेका) में 18 अप्रैल को विश्व धरोहर दिवस पूरे उत्साह और औपचारिक गरिमा के साथ मनाया गया। कार्यक्रमों की श्रृंखला, सांस्कृतिक प्रस्तुतियां और विरासत संरक्षण के संदेशों के बीच एक अलग ही तस्वीर भी सामने आई जहां मंच पर विरासत बचाने की बातें गूंजती रहीं, वहीं उसी परिसर का एक बहुचर्चित प्रोजेक्ट बदहाली की कहानी बयां करता नजर आया।कार्यक्रम की शुरुआत ‘जीवित विरासत’ विषय पर विशेष प्रस्तुति से हुई, जिसमें अधिकारियों, कर्मचारियों और विद्यार्थियों ने बढ़-चढ़कर हिस्सा लिया। पारंपरिक संस्कृति, रीति-रिवाजों और सांस्कृतिक विविधता को आधुनिक संदर्भ में समझाने की कोशिश की गई। इसके बाद शाम के समय प्रशासनिक कार्यालय परिसर से एक भव्य लोक नृत्य शोभायात्रा निकाली गई, जो देशबंधु लोको हेरिटेज पार्क तक पहुंची। यहां कलाकारों ने रंगारंग प्रस्तुतियों से माहौल को जीवंत बना दिया।कार्यक्रम में महाप्रबंधक मोहित चंद्रा सहित कई वरिष्ठ अधिकारी और कर्मचारी मौजूद रहे। अपने संबोधन में उन्होंने चिरेका की समृद्ध विरासत पर प्रकाश डालते हुए सभी से इसे संरक्षित रखने की अपील की। उन्होंने लोगों को हेरिटेज स्थलों के भ्रमण और उनके महत्व को समझने के लिए प्रेरित किया।लेकिन इसी चमक-दमक के बीच एक बड़ा सवाल भी उठ खड़ा हुआ। जिस देशबंधु लोको पार्क को विरासत और पर्यटन के मॉडल के रूप में विकसित किया जाना था, वहीं का ‘जी-9’ प्रोजेक्ट आज उपेक्षा का शिकार बना हुआ है। करोड़ों रुपये की लागत से तैयार किया गया यह प्रोजेक्ट अब प्रशासनिक लापरवाही और योजनात्मक विफलता का उदाहरण बन गया है।29 मई 2023 को तत्कालीन महाप्रबंधक सतीश कुमार कश्यप द्वारा बड़े ही धूमधाम से जी-9 डब्ल्यूएजी-9 इंजन की आकर्षक रेप्लिका का उद्घाटन किया गया था। उस समय इसे चिरेका की आधुनिक सोच और रेलवे विरासत को नए रूप में प्रस्तुत करने की पहल के तौर पर प्रचारित किया गया था। योजना थी कि इस इंजन को रेस्टोरेंट और पर्यटन आकर्षण के रूप में विकसित किया जाएगा, जिससे स्थानीय लोगों और पर्यटकों को नया अनुभव मिल सके।लेकिन तीन साल बीत जाने के बाद भी यह योजना कागजों से बाहर नहीं निकल सकी। जिस स्थान को एक जीवंत पर्यटन केंद्र बनना था, वह आज वीरान पड़ा है। न तो यहां कोई रेस्टोरेंट शुरू हो पाया है और न ही रखरखाव की कोई नियमित व्यवस्था दिखाई देती है। धीरे-धीरे यह प्रोजेक्ट अपनी चमक खोता जा रहा है और एक अधूरी सोच का प्रतीक बनकर रह गया है।स्थानीय लोगों में इसको लेकर भारी नाराजगी है। उनका कहना है कि शुरुआत में इस परियोजना को लेकर काफी उम्मीदें थीं, लेकिन समय के साथ प्रशासन की उदासीनता ने उन उम्मीदों को खत्म कर दिया। करोड़ों की लागत से बनी यह संरचना अब केवल एक सजावटी ढांचा बनकर रह गई है, जिसका कोई स्पष्ट उपयोग नहीं है।सबसे गंभीर पहलू यह है कि जिस उद्देश्य से इस प्रोजेक्ट की शुरुआत हुई थी वह उद्देश्य पर्यटन को बढ़ावा देना और आम लोगों के लिए आकर्षण केंद्र तैयार करना था जो पूरी तरह विफल होता नजर आ रहा है। ऐसे में विश्व धरोहर दिवस जैसे अवसर पर उठे सवाल और भी प्रासंगिक हो जाते हैं। जब नई धरोहरों को ही संभालने में लापरवाही बरती जा रही है, तो पुरानी विरासतों के संरक्षण के दावे कितने सार्थक हैं।यदि समय रहते इस दिशा में ठोस कदम नहीं उठाए गए, तो ‘जी-9’ प्रोजेक्ट केवल एक असफल योजना और सरकारी संसाधनों की बर्बादी का उदाहरण बनकर रह जाएगा और विरासत संरक्षण के नाम पर किए जाने वाले आयोजन केवल औपचारिकता बनकर रह जाएंगे।

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